A photograph of women voters in Madhepura, Bihar, showing their inked fingers.

बिहार के मधेपुरा में महिला मतदाता । Photo courtesy: Chief Electoral Officer, Bihar/ Facebook

बिहार में जातिगत राजनीति की दीवार तोड़ता महिला वोट बैंक

जाति आधारित राजनीति ने लोकतंत्र और बिहार के विकास को लंबे समय तक हाशिये पर रखा। लेकिन अब बिहार में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। महिलाएं, विशेषकर युवतियां, अपने मताधिकार को लेकर सजग और मुखर हुई हैं। उभरता हुआ महिला वोट बैंक जातीय राजनीति की जकड़न को कमज़ोर कर रहा है।

बिहार में जातीय राजनी‍ति एक कड़वी सच्‍चाई है। यहां जातीय संघर्ष  और  सत्‍ता पर अगड़ी जातियों के वर्चस्‍व को चुनौती देने का लंबा इतिहास रहा है । दशकों से विभिन्‍न राजनीतिक दलों ने बिहार का चुनावी रण जीतने और सत्‍ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए जातीय गोलबंदी को प्रमुख हथियार की तरह इस्‍तेमाल किया। इस दोधारी हथियार की मार ने लोकतंत्र और राज्‍य के विकास, दोनों को ही लंबे समय तक हाशिये पर रखा। लेकिन अब एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। बिहार में उभरता हुआ महिला वोट बैंक जातीय राजनीति के शिकंजे को कमज़ोर कर रहा है और लोकतांत्रिक राजनीति में एक नई ऊर्जा का संचार कर रहा है। जहां पहले चुनावी गणित जातीय समीकरणों पर आधारित होता था, वहीं अब महिलाएं, विशेषकर युवा मतदाता, महिला केंद्रित कल्‍याणकारी योजनाओं, शिक्षा, सुरक्षा और विकास के मुद्दों के आधार पर वोट दे रही हैं। पिछले एक दशक में यह भी देखा गया है कि महिलाएं अपने मताधिकार को लेकर सजग और मुखर हुई हैं और अब अपने मतदान का निर्णय स्‍वयं ले रही हैं।

पूरे देश में 2023-24  के दौरान छत्‍तीसगढ़, मिज़ोरम, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्‍मू व कश्‍मीर, ओडि़शा, हरियाणा, महाराष्‍ट्र और झारखंड समेत कुल 13 राज्‍यों में विधानसभा चुनाव हुए। अधिकांश राज्‍यों में यह स्‍पष्‍ट दिखा कि महिलाओं की भागीदारी चुनाव परिणाम में निर्णायक रही। सत्‍ता की कुंजी उसी पार्टी को मिली जिसपर महिला मतदाताओं ने वोट बरसाए। यही वजह है कि चुनाव के पहले और चुनाव के बाद भी राजनीतिक दल महिला केंद्रित कल्‍याणकारी योजनाओं की घोषणाओं की झड़ी लगा देते हैं।

महिला वोट बैंक की ताकत का अहसास सबसे पहले बिहार विधानसभा चुनाव- 2015  के दौरान हुआ। बिहार में सामाजिक सुधारों के प्रयास की बदौलत सतह के नीचे शांत भाव से यह वोट बैंक एकजुट होता गया और बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में इसने अपनी ताकत का लोहा मनवा दिया। अब यह कोई छिपा सच नहीं है कि बिहार के मुख्‍यमंत्री नी‍तीश कुमार ने योजनाबद्ध तरीके से इस वोट बैंक को संवारा और सींचा। उनकी पार्टी जदयू इसी महिला वोट बैंक के सहारे बिहार के चुनावी दंगल में बढ़त बनाती रही है। यही वह बड़ी वजह भी है कि भाजपा और राजद के बीच नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने और बनाए रखने की होड़ लगी रहती है। नीतीश सरकार की महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण की विभिन्‍न योजनाओं जैसे साईकिल योजना, मुख्‍यमंत्री बालिका पोशाक योजना,  मुख्‍यमंत्री कन्‍या उत्‍थान योजना,  मुख्‍यमंत्री कन्‍या सुरक्षा योजना, शराबबंदी, जीविका स्‍व सहायता समूह, पंचायत और नगर निकाय चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण, स‍रकारी नौकरी में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण  आदि ने महिला मतदाताओं को मज़बूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्‍थापित किया। इसी कड़ी में बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के ठीक पहले वृद्धावस्‍था पेंशन योजना की राशि में सम्‍मानजनक बढ़ोतरी और मुख्‍यमंत्री महिला रोज़गार योजना के तहत करीब डेढ़ करोड़ महिलाओं के बैंक खाते में दस हज़ार रुपये की नकद राशि के ट्रांसफर ने भी अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है।

बिहार में 2023 के जातिगत सर्वेक्षण के अनुसार नीतीश कुमार का जातिगत वोट बैंक मात्र डेढ़ से दो प्रतिशत है। उनकी जीत का आधार वह महिला वोट बैंक है, जिसने जातिगत राजनीति से उपर उठकर जदयू पर भरोसा जताया । पिछले चुनाव परिणाम के आंकड़े इस तथ्‍य को पुष्‍ट करते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव-2020 के पहले चरण में महिलाओं का मतदान पुरुषों से दो प्रतिशत कम रहा और इस चरण में महागठबंधन ने भारी जीत हासिल की। दूसरे चरण में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा और एनडीए ने बढ़त बनाई। तीसरे चरण में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले 10 प्रतिशत अधिक रहा और एनडीए ने भारी विजय हासिल की। इस चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने बिहार की कुल 243 सीटों में से 43 सीटें जीतीं, जिनमें 37 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले बढ़-चढ़कर वोट किए।

बिहार में महिला वोट बैंक के समानांतर वह युवा वोट बैंक भी तेज़ी से प्रभावी हो रहा है, जो उद्योगों की स्‍थापना, रोज़गार और सरकारी नौकरी जैसे मुद्दों पर मतदान कर रहा है। युवाओं का यह वर्ग भी जातिगत राजनीति को दरकिनार कर अपने आर्थिक सशक्‍तिकरण और उत्‍थान के लिए वोट कर रहा है। भारतीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार के कुल 7.41 करोड़ मतदाताओं में से 46 प्रतिशत 18-39 आयु वर्ग के हैं। इनमें भी 22 प्रतिशत 18-29 आयु वर्ग के हैं। यह युवा वर्ग भी चुनाव परिणाम पर निर्णायक असर डालेगा।

एडीआर (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) के बिहार के संयोजक और एक्‍शन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेन्स के संस्‍थापक राजीव कुमार बताते हैं कि बिहार में महिला वोट बैंक काफी मुखर हुआ है। शिक्षित और आर्थिक रूप से सशक्‍त महिलाएं अपना वोट अपनी पसंद के अनुसार डालती हैं। पंचायत और नगरपालिका चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण के कारण महिलाएं राजनीतिक रूप से आत्‍मनिर्भर हुईं हैं। बिहार में अब सरपंच पति की भूमिका काफी कम हो गई है। लोकतंत्र स्‍वत: वहां मज़बूत होता है, जहां सामाजिक सुधार के काम और सामाजिक आंदोलन होते हैं। बिहार में देखा जाए तो मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का जातीय आधार (कुर्मी-कुशवाहा) एक या दो प्रतिशत है। बिहार की शिक्षित व नौकरी करने वाली नई पीढ़ी अब तर्क की कसौटी पर अपने मतदान का निर्णय ले रही है। हमने एक अध्‍ययन में पाया कि महिलाओं की सोच ज़्यादातर निष्‍पक्ष होती है। जहां महिलाएं निर्वाचित होती हैं, वहां शासन बेहतर होता है और चुनावी हिंसा भी बहुत कम होती है। हां, महिला उम्‍मीदवारों की जीत की संभावना पुरूषों के मुकाबले कुछ कम ज़रूर होती है, क्‍योंकि वे चुनाव में बाहुबल का इस्‍तेमाल नहीं करती हैं।

पटना के एएन सिन्‍हा सामाजिक अध्‍ययन संस्‍थान के पूर्व निदेशक व आर्थिक व सामाजिक विश्‍लेषक डॉ डीएम दिवाकर का कहना है कि बिहार के महिला वोट बैंक में भी दो वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग वह भी है, जिसमें सामाजिक चेतना का असर नहीं हुआ है, वह आज भी परिवार के पुरूष सदस्‍य के निर्णय के अनुसार मतदान करती हैं, मगर इनकी संख्‍या तेज़ी से घट रही है। शिक्षित और सशक्‍त महिलाएं अपने वोट का निर्णय स्‍वतंत्र रूप से ले रही हैं। इसमें दो राय नहीं है कि चुनाव के पहले मुख्‍यमंत्री महिला रोज़गार योजना की दस हज़ार की सहायता राशि का भी असर होगा। हालांकि तमाम प्रयासों के बावजूद बिहार में महिला और पुरुष साक्षरता दर का गैप बरकरार है। उच्‍च शिक्षा में ड्रॉप-आउट रेट अब भी ज्‍यादा है और तकनीकी शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी नगण्‍य है। बिहार में अभी लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से सामाजिक सुधार के प्रयास करने होंगे। चुनाव में उपहार देने का दूरगामी असर नहीं होता है।

पटना की दीघा विधानसभा क्षेत्र से सीपीआई (एमएल) की टिकट पर महागठबंधन युवा उम्‍मीदवार दिव्‍या गौतम कहती हैं कि इमसें कोई दो राय नहीं है कि बिहार में महिलाएं जातीय आधार से उपर उठकर वोट कर रही हैं। उनके समर्थन के बगैर अब कोई सरकार नहीं बन सकती। पहले जाति एक यूनिट की तरह काम करता था अब महिला वोट बैंक एक यूनिट बन गया है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर महिला केंद्रित कल्‍याणकारी योजनाओं को तरजीह दे रहे हैं। हालांकि चुनाव के ठीक पहले महिलाओं को दस हज़ार रुपये की सहायता को वे रिश्‍वत मानती हैं। कहती हैं कि जब काम नहीं होता है तो रिश्‍वत देकर वोट खरीदने की कोशिश होती है। महिलाओं ने दस हज़ार रूपये नहीं बल्कि कर्ज़ माफी मांगी थी। वर्तमान सरकार की कई योजनाओं ने महिलाओं को कर्ज़ के दलदल में धकेल दिया है। बिहार की महिलाएं जागरूक हैं, वे सोच-समझकर निर्णय लेंगी।

लेखक और राजनीतिक विश्‍लेषक भैरव लाल दास कहते हैं कि चंपारण और सत्‍याग्रह आंदोलन पर शोध के दौरान उन्‍होंने पाया कि बिहार की महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी नगण्‍य रही। फिर जातीय राजनीति और पितृसत्‍तात्‍मक समाज ने महिला वोट बैंक को बनने नहीं दिया। पिछले कुछ सालों में सरकारी कल्‍याणकारी योजनाओं की बदौलत महिलाओं का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण हुआ, जिससे वे जाति देखकर नहीं बल्कि कल्‍याणकारी योजनाओं के लिए जमकर वोटिंग कर रही हैं।

सुमिता जायसवाल एक वरिष्ठ पत्रकार और फैक्ट-चेक ट्रेनर हैं, जिन्हें 22 वर्षों का अनुभव है। वह वर्तमान में दैनिक जागरण के लिए काम करती रही हैं। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के जनसंचार और पत्रकारिता विभाग में अतिथि फैकल्टी सदस्य के रूप में अध्‍यापन कार्य भी किया है।

दिव्या आर्य द्वारा संपादित

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