President Droupadi Murmu interacting with members of 75 Particularly Vulnerable Tribal Groups from various parts of the country at Rashtrapati Bhavan, New Delhi, June 2023.

जून 2023 में राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों के सदस्यों के साथ बातचीत करते हुए। Photo courtesy: Official President of India page on Facebook

महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और आदिवासी महिलाएं

मैं महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी से 2015 से परिचित हूँ जब वो झारखण्ड कि राज्यपाल बनकर झारखण्ड आयीं I पहली महिला राज्यपाल, वो भी मेरे अपने आदिवासी समुदाय से- ये सुखद अनुभव था जब पहली बार सुना कि आदिवासी महिला राज्यपाल राज्य को मिली I

मैं महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी से 2015 से ही परिचित हूँ जब वो झारखण्ड कि राज्यपाल बनकर झारखण्ड आयीं I पहली महिला राज्यपाल, वो भी मेरे अपने आदिवासी समुदाय से- ये सुखद अनुभव था जब पहली बार सुना कि आदिवासी महिला राज्यपाल राज्य को मिली I झारखण्ड के इतिहास में उनका राज्यपाल के तौर पर कार्यकाल सबसे लम्बा रहा है I

एक आदिवासी महिला के हिसाब से महामहिम द्रौपदी मुर्मू जी के राष्ट्रपति बनने के वर्ष, यानि कि 2022 में, जब वो राष्ट्रपति बनी, मैं उस वर्ष एक कोहोर्ट में थी। तब मुझे मेरे साथी “मुर्मू मैडम, “ मुर्मू मैडम” बोलते हुए खूब बधाई देते थे I ये सुखद यादें हैं अभी भी I

उसी कोहोर्ट के “टैलेंट नाईट“ कार्यक्रम में मैंने महामहिम के शपथ ग्रहण के बाद दिए गए स्पीच का ऐक्ट किया था। उनका देश के सर्वाच्च पद पर पहुंचना सचमुच में आदिवासियों के लिए गर्व की बात है। मुझे अच्छी तरह याद है कि कई कार्यकर्मो में आदिवासी होने के नाते मुझे महामहिम मुर्म जी के कारण आदिवासियों के मुद्दों पर बोलने और आदिवासियों के नजरिये को सुनने का मौक़ा मिला, विशेष कर जिस वर्ष उन्होंने शपथ लीI

जब हम जेंडर के नज़र से महामहिम द्रौपदी मुर्मू जी के सर्वोच पद एवं भारत देश के प्रथम नागरिक होने के गौरव को महसूसना चाहते हैं तो कई एक राजनीतिक पहलू हैं जिनके बारे में बिलकुल ज़मीनी स्तर की महिलाओं के लिए और आदिवासी समुदाय के लिए जो राजनीतिक स्तिथि है उसके बारे में जिक्र करना जरुरी है I

क्या बाकि महिलाओं के लिए विशेष करके आदिवासी महिलाओं के लिए जो उनकी डिगनिटी की बात है क्या वो सुनिश्चित हो पाई है? राज्य प्रायोजित हिंसा का नग्न नाच जो मणिपुर में हुआ वो आदिवासी समाज याद रखेगा। जिस तरह इतने बड़े अमानवीय घटना पर देश की राजनीति में सत्ता की पार्टी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है, इसलिए राष्ट्रपति महोदया का अपने समुदाय की महिलाओं के प्रति संवेदना का न दिखना राजनीति से जुड़ा tokenism से लाया गया पद के बारे भी पता लग जाता है. देश भर में दो सौ मिलियन आदिवासी आबादी का जीवन यापन और आजीविका आज भी सीधे जंगलों और जमीन से जुड़ा है। लेकिन जो हाल आदिवासियों की जीवनरेखा- जंगल- को उजाड़ कर आदिवासियों को उनके ही अधिकार से वंचित किया जा रहा है ये जगजाहिर है I

जिस आदिवासी समाज से महामहिम आती हैं,वो आदिवासी समाज (अनुसूचित जनजाति), आज भी भारत देश के सबसे हाशिये के समाज हैं जिनके लिए भारतीय सविंधान में छटवी अनुसूची (sixth schedule), पांचवी अनुसूची (fifth schedule) PESA एक्ट (Panchayat Extension to Scheduled Areas एक्ट 1996), Forest Rights Act 2006 और जमीन की रक्षा के लिए कई तरह के कानून बने हुए हैं। इस सबके बावजूद आदिवासियों के साथ जिस तरह का प्रशासनिक स्तर पर संरचनात्मक अन्याय होता आया है वो आज भी बरक़रार है। किसी की भी राजनीति अगर किसी खास मकसद से निकली हो तो वो जरुर अपने समुदाय, अपने समाज को आगे ले जाने की वजह जरुर होती है, किन्तु जिस tokenism (टोकानिज्म),की राजनीति के तौर पे “आदिवासी राष्ट्रपति” देश को सत्तारूढ़ BJP पार्टी ने देश को दिया वो केवल दिखावे की राजनीति से प्रयोजित है। जिनके पास “सत्ता” है वो क्या दिखाना चाहते हैं? वो ये दिखाना चाहते हैं कि हमने आदिवासियों को वो दिया है जो कभी हुआ नहीं , किंतु उसके पीछे हसदेव अरण्य में जंगल उजाड़ने वाले प्रोजेक्ट, झारखण्ड का सारंधा जंगल (Asia’s Largest Sal Forest Located in Jharkhand, West Singhbhum district) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा Wildlife Sanctuary बनाने के जो आदेश लाये गयें हैं , वो सीधे ही आदिवासी समुदाय की आजीविका और संस्कृति को प्रभावित करेगा। पूरी राजनीति का आंकलन करने से आप पाएंगे कि लोकसभा की 543 सीटों में से केवल 10 सीटों पर आदिवासी महिला सांसद 2024 में लोकसभा सदन पहुँचीं हैं जो ये बताने को काफी है कि आदिवासी महिलाओं को राजनीति के स्तर पर भी अभी लम्बा रास्ता तय करना है I

DELHI से 1338KM दूर झारखण्ड के सिमडेगा जिले की कोलेबिरा गाँव की 56 वर्ष की बेयंती कंदुलना (BEYANTI KANDULNA) जो पिछले साल ही DELHI से लौटी है, DELHI में घरेलु कंकर महिला के तौर पर 30 साल काम किया और अब गाँव लौट आई है। उनसे और उनकी 51 वर्षीय पडोसी महिला, ज्योति लुगुन से हमारी चाय की दुकान पर मुलाकात हुई। हम भी उसी ग्रामसभा बैठक में गये थे जहाँ वो दोनों दीदी अपना वृद्धा पेंशन का फॉर्म लेकर मुखिया (सरपंच) से मिलने पहुंची थी। हमने बस पूछ लिया देश में आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं, कैसा लगता है ? बेयंती कन्दुलना दीदी बोलती हैं कि कुछ कह नहीं सकते सुना है संथाली समुदाय से हैं। इधर संथाली समुदाय बहुत कम हैं. फिर अपनी बात बताती हैं की 30 साल DELHI में घर साफ सफाई, खाना बनाने का काम करती थी तो वोटर कार्ड भी नहीं है अपने गाँव में I

ज्योति लुगुन बताती हैं सुना है आदिवासी मुर्मू महिला राष्ट्रपति हैं। पर उससे ज्यादा देश में क्या हो रहा है, नहीं जानते क्यूंकि ससुर के गुजरने के बाद अख़बार लेना बंद हो गया हैI

फिर दोनों दीदी मुझे अपना वृद्धा पेंशन फॉर्म भरने को कहती हैं जिसे मैं भर देती हूँ I

यहाँ एक और जरुरी मसला ये है की “नेशनल कैम्पेन कमिटी फॉर ऐरीडीकेसन ऑफ BOUNDED लेबर{NCCEB } द्वारा जारी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बंधुआ मजदूरी से रेस्क्यू किये गये मजदूरों में 13% आदिवासी {ST} हैं, जिनके पुनर्वास, मुआवजा और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर न्याय संगत काम नहीं हो सका क्यूंकि 80% केस में FIR नहीं हो पाया। ये सब मामले ये बताने को काफी हैं की सामाजिक न्याय या जस्टिस के मामलों में आदिवासियों को क्या मिला है और राजनीतिक इच्छाशक्ति कहाँ है ?

एक और मुख्यबिंदु है कि ग्रामीण भारत के सुदूरवर्ती गांवों के आदिवासी लोग, और विशेष रूप से महिलाएं, आज भी मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियों में जिला अध्यक्ष, प्रखंड अध्यक्ष या पंचायत स्तर की अध्यक्ष नहीं बनायीं जाती हैं। महिला राजनीति में रह के कार्यकर्ता या महिला मोर्चा तक सिमटा दी जाती हैं, ऐसे में महिलाओं, विशेषकर आदिवासी महिलाओं –लड़कियों का जिनका उनकी भाषा , रहन –सहन, वेशभूषा ,सरलता के कारण सबसे सस्ते श्रम के लिए दोहन होता आया है, आज भी उसी परिस्तिथि में है जो महामहिम राष्ट्रपति के 2022 में राष्ट्रपति बनने से पहले थी I

बल्कि ये मैं देख पा रही हूँ कि आदिवासी समुदाय आज भी निर्णय लेने की जगह पे नहीं है, चाहे वो राजनीतिक सत्ता के स्तर पर हो, औधोगिक क्षेत्र में हो, न्यायिक क्षेत्र हो या फिर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की बात हो, आज भी आदिवासियों के लिए निर्णय जो ले रहे हैं वो दुसरे समुदाय से आते हैं, लिहाजा मुझे लगता है कि देश की राष्ट्रपति का आदिवासी होना एक ऐतिहासिक बात जरुर है किन्तु देश के 8.6%आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, जानवर और आदिवासी समुदाय की औरतों का बड़े पैमाने पर शोषण जैसे मुद्दे आज भी वहीं के वहीं हैं। जिस प्रकार की SYSTEMATIC CHANGE की नीयत आदिवासियों के संरक्षण, संवर्धन और मजबूती भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए है वो आज भी क्रियान्वित नहीं हो पा रही हैं I

जंगल में नक्सलवादी, शहरों में प्रवासी मजदूर और घरेलु कामगार महिला की पहचान से जब आदिवासी समाज निकल पायेगा तब ही राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बराबर हो पायेगा।

जो बात बेयंती और ज्योति ने कही कि अभी कुछ कह नहीं सकते कि राष्ट्रपति आदिवासी है तो कैसा लगता है, वो ठीक ही है क्यूंकि जब समाज आज भी असुरक्षित महसूस कर रहा हो–सिस्टम में कोई बदलाव नहीं देख पा रहे हैं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा कि देश की राजधानी के राष्ट्रपति भवन में एक आदिवासी महिला देश के सर्वोच्च पद पर बैठी हैं I

रवलीन कौर द्वारा संपादित

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ऑगस्टीना सोरेंग झारखंड के सिमडेगा जिले की पत्रकार हैं और 2025-26 की एनडब्ल्यूएमआई फेलो हैं।

 

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