चुनावी शोर में मौन खड़ा है बूथ स्तर महिला पदाधिकारियों के संघर्ष का सवाल
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के काजी मुहम्मदपुर थाना क्षेत्र की शिक्षिका आशा मिंज, जिन्हें विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) कार्य के दौरान बीएलओ (Booth level officer ) के रूप में नियुक्त किया गया था, की मौत ने महिला बीएलओ के मानसिक तनाव और अतिरिक्त कामकाज के संघर्ष बारे में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आशा मिंज मिठनपुर थाना क्षेत्र के मध्य विद्यालय कन्हौली नई तालीम स्कूल में शिक्षिका थीं। अगस्त, 2025 के आखिरी सप्ताह में 58 वर्षीया महिला शिक्षक मोबाइल घर पर छोड़कर कहीं चली गईं । स्वजनों ने काजी मोहम्म्दपुर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। दो दिनों बाद पुलिस ने उनका शव मुजफ्फरपुर में एक रेलवे ट्रैक से बरामद किया। शिक्षक संघ और स्वजनों के अनुसार आशा को एक अगस्त को बीएलओ के रुप में नियुक्त किया गया था। उन्हें स्मार्ट फोन से काम करने की तकनीकी जानकारी नहीं थी और मतदाता सूची का कार्य आनलाइन करने में भी वे सहज नहीं थीं। उनपर आनलाइन काम करने और सुपरवाइजर द्वारा देर रात तक मतदाता सूची का कार्य जल्द करने का दबाव था। इससे वे काफी तनावग्रस्त रहती थी। स्वजनों का कहना है कि काम के अत्यधिक तनाव के कारण ही उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। आशा मिंज की यह दुखद कहानी अकेली घटना नहीं है, ऐसी कई घटनाएं हैं जो बूथ स्तर के महिला पदाधिकारियों के संघर्ष को उजागर करती हैं।
बीएलओ के अनुभव: कठिनाई और संघर्ष
बिहार में चुनावी प्रक्रिया के दौरान मेरी मुलाकात दो महिला बीएलओ से हुई और मेरा अनुभव दोनों को लेकर बहुत अलग रहा। इस लेख में निजता की परवाह करते हुए किसी भी महिला का नाम नहीं दिया गया है।
मुजफ्फरपुर निर्वाचन क्षेत्र की एक महिला बीएलओ (भाग संख्या 355) ने बताया कि उन्हें किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिली, जबकि काम घर-घर जाकर काम करना होता है। कई बार उन्हें दबंग समाज के पुरुषों द्वारा “घर के बाहर बैठकर काम करने” को कहा गया और समाज में मौजूद पूर्वाग्रहों का सामना भी करना पड़ा। उम्रदराज होने के कारण थकान और तनाव भी बढ़ता गया, फिर भी उन्होंने अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से निभाया।
इसके विपरीत, उसी क्षेत्र की एक अन्य बीएलओ (भाग संख्या 354) ने अपना सारा काम, मतदाता सूची में नाम जोड़ने से लेकर एसआइआर के तहत गणना प्रपत्र भरने तक, अपने बेटे से करवाया इतना ही नहीं, लोगों से इस काम के बदले पैसे भी लिए गए, जबकि यह सेवा नि:शुल्क है। ऐसे उदाहरण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जिम्मेदारी के साथ-साथ जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
दबाव, तकनीकी चुनौतियां और मानसिक तनाव
उपरोक्त उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बीएलओ बनने वाले अधिकांश कर्मचारियों की तकनीकी जानकारी सीमित होती है। कई महिला कर्मचारियों ने कभी इंटरनेट या स्मार्टफोन का उपयोग नहीं किया होता है। फिर भी उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे ऑनलाइन फॉर्म भरें, डेटा अपलोड करें और रिपोर्ट भेजें।
ऐसे में तकनीकी जानकारी की कमी, सामाजिक दबाव, और उच्च अधिकारियों की सख्ती — यह सब मिलकर उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है। आशा मिंज की आत्महत्या इसी दवाब की भयावह परिणति है।
देखा जाता है कि चुनाव के दौरान हर मीडिया में हमेशा मतदाताओं, चुनावी सभाओं, नेताओं, भाषणों और रैलियों की चर्चा होती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। क्योंकि चुनाव इन्हीं मुदृों के इर्द-गिर्द घूमता है- मतदाता किसे वोट देंगे, नेताओं की चुनावी सभाएं कहां-कहां आयोजित की जाएंगी , किस नेता की जनसभा में कितनी भीड़ रही और किसने कितने लोकलुभावन वादे किए। लेकिन, इस चुनावी शोर-शराबे में जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों, विशेषकर महिला बीएलओ के संघर्ष की बातें कहीं गुम हो जाती हैं।
दीगर है कि बिहार में जून से सितंबर के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद हड़कंप मच गया था। कई लोगों के नाम मतदाता सूची से कट गए, कुछ लोग गणना प्रपत्र भर नहीं पाए तो कई को गणना प्रपत्र भरने नहीं आता था, किसी के पास इंटरनेट या कोई और साधन नहीं था कि वे अपने नाम को वेरिफाई करा सकें। यहां बीएलओ की भूमिका शुरू होती है। वे घर-घर जाकर लोगों की जानकारी जुटाते हैं, आवेदन भरवाते हैं, मतदाता सूची में सुधार करते हैं, ताकि हर नागरिक लोकतंत्र के महापर्व में अपने मतदान देने के अधिकार का प्रयोग कर सके। बीएलओ यह काम अपने घर-परिवार और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच सामंजस्य बैठाते हुए करते हैं। उनका कार्य अक्सर मानसिक और शारीरिक रूप से काफी थकाने वाला है।
बीएलओ की जिम्मेदारियां
बीएलओ चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त किए जाते हैं ताकि मतदाता सूची और मतदान केंद्रों से जुड़ा हर काम सुचारु रूप से हो सके। उनके कार्यों में शामिल हैं —
- अपने क्षेत्र के सभी मतदाताओं का सही रिकॉर्ड रखना।
- नए वोटर आइडी के लिए आवेदन लेना और जांच करना।
- गलत या मृत मतदाताओं के नाम हटाना।
- मतदान केंद्रों की व्यवस्थाओं की देखरेख करना।
- मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया की जानकारी देना।
आम तौर पर बीएलओ किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी हो सकते हैं, जैसे — शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, पटवारी, अमीन, पंचायत सचिव, स्वास्थ्य कर्मी, एएनएम, मिड-डे मील कार्यकर्ता, नगर निगम के लिपिक, डाकिया या बिजली विभाग के कर्मचारी। कई जगहों पर शिक्षिकाओं की संख्या अधिक होने के कारण महिला बीएलओ भी ज्यादा हैं।
बदलाव की ज़रूरत
लोकतंत्र का पर्व तभी सार्थक होगा जब उसे निभाने वाले हर कर्मी की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। बीएलओ के लिए उचित प्रशिक्षण, निश्चित कार्य-घंटे, तकनीकी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसी व्यवस्थाएं की जानी चाहिए। खासकर महिला बीएलओ को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य परिवेश देना आवश्यक है।
आखिर लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने वालों से नहीं, बल्कि उन कर्मियों से भी चलता है जो यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नागरिक का नाम मतदाता सूची में बना रहे।
सौम्या ज्योत्स्ना 2019 से पत्रकारिता से जुड़ी हैं और लाडली मीडिया अवॉर्ड से तीन बार सम्मानित हो चुकी हैं। इसके अलावा कई फेलोशिप का हिस्सा भी रही हैं। वे वर्तमान में फ्रीलांस काम कर रही हैं और बिहार यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं।
सुमिता जायसवाल द्वारा संपादित
Please find the English version here









